।।ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।।।।पुरुषोत्तम मास कृष्ण पक्ष एकादशी।।।।ज्येष्ठ अधिक मास कृष्ण पक्ष एकादशी।।।।परमा एकादशी।।
पुरुषोत्तम मास ज्येष्ठ अधिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को परमा एकादशी के नाम से जाना जाता है। ऐसी मान्यता है और पौराणिक कथाओं में उल्लेख है कि इस व्रत के प्रभाव से ही धन के देवता कुबेर ने अपनी संपत्ति प्राप्त की थी और राजा हरिशचंद्र को अपना खोया हुआ राज्य और परिवार वापस मिला था। परमा एकादशी का पुण्य अश्वमेध यज्ञ के समान माना जाता है।
परमा एकादशी 2026 व्रत
वैदिक पंचांग के अनुसार पुरुषोत्तम मास, ज्येष्ठ अधिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी दिनाँक 10 जून 2026 बुधवार की रात्रि 12 बजे के बाद 11 जून 2026 को 12 बजकर 57 मिनट (AM) पर प्रारंभ होगी।
जो 11 जून 2026 गुरुवार को ही रात्रि 10 बजकर 36 मिनट पर समाप्त हो रही है।
चूँकि यह तिथि अधिक मास में आ रही है । अतः पुरुषोत्तम मास, ज्येष्ठ अधिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी परमा एकादशी का व्रत दिनाँक 11 जून 2026 गुरुवार को करना चाहिए।
व्रत के पारण का समय दिनाँक 12 जून 2026 शुक्रवार को प्रातः 05 बजकर 23 मिनट से प्रात: 08 बजकर 10 मिनट के मध्य रहेगा।
।।परमा एकादशी का महत्त्व।।
धर्मराज युधिष्ठिर कहने लगे कि, हे जनार्दन! आपने सभी एकादशियों का विस्तारपूर्वक वर्णन कर मुझे सुनाया, अतः अब आप कृपा करके मुझे अधिकमास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? तथा उसकी विधि क्या है? इन सब के बारे मे बताइए।
श्री भगवान बोले, हे राजन्! पुरुषोत्तम मास या अधिकमास में कृष्ण पक्ष में जो एकादशी आती है वह परमा एकादशी कहलाती है। वैसे तो प्रत्येक वर्ष में 24 एकादशियां होती हैं। जब पुरुषोत्तम मास या अधिक मास आता है, तब इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। पुरुषोत्तम मास या अधिकमास को जोड़कर वर्ष में 26 एकादशियां होती हैं। अधिकमास में 2 एकादशियां होती हैं, जो कृष्ण पक्ष में परमा एकादशी एवं शुक्ल पक्ष में पद्मिनी एकादशी के नाम से जानी जाती हैं।
भगवान कृष्ण बोले: पुरुषोत्तम मास में अनेकों पुण्यों को देने वाली कृष्ण पक्ष की एकादशी, परमा एकादशी का पुण्य अश्वमेध यज्ञ के समान माना जाता है। यह एकादशी धन-वैभव प्रदान कर, पापों का नाश कर उत्तम गति प्रदान करती है। इस व्रत के प्रभाव से ही धन के देवता कुबेर ने अपनी संपत्ति प्राप्त की थी और राजा हरिशचंद्र को अपना खोया हुआ राज्य और परिवार वापस मिला। हे राजन! ध्यानपूर्वक इस परमा एकादशी व्रत कथा को सुनो।
।।परमा एकादशी व्रत कथा।।
काम्पिल्य नगरी में सुमेधा नामक एक ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ निवास करता था। ब्राह्मण बहुत धर्मात्मा था और उसकी पत्नी पतिव्रता स्त्री थी। यह परिवार बहुत सेवाभावी था। दोनों स्वयं भूखे रह जाते, परंतु अतिथियों की सेवा हृदय से करते थे। धनाभाव के कारण एक दिन ब्राह्मण ने अपनी पत्नी कहा- धनोपार्जन के लिए मुझे परदेस जाना चाहिए, क्योंकि इतने कम धनोपार्जन से परिवार चलाना अति कठिन काम है। ब्राह्मण की पत्नी ने कहा- मनुष्य जो कुछ पाता है, वह अपने भाग्य से ही पाता है। हमें पूर्व जन्म के कर्मानुसार उसके फलस्वरूप ही यह गरीबी मिली है अत: यहीं रहकर कर्म कीजिए, जो प्रभु की इच्छा होगी वही होगा। पत्नी की बात ब्राह्मण को जंच गई और उसने परदेस जाने का विचार त्याग दिया। एक दिन संयोगवश कौण्डिल्य ऋषि उधर से गुजर रहे थे, जो ब्राह्मण के घर पधारे। ऋषि कौण्डिल्य को अपने घर पाकर दोनों अति प्रसन्न हुए। उन्होंने ऋषि की खूब आव-भगत की। उनका सेवाभाव देखकर ऋषि काफी खुश हुए और पति-पत्नी द्वारा गरीबी दूर करने का प्रश्न पूछने पर ऋषि ने उन्हें पुरुषोत्तम मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली परमा एकादशी करने की प्रेरणा दी। व्रती को एकादशी के दिन स्नान करके भगवान विष्णु के समक्ष बैठकर हाथ में जल एवं फूल लेकर संकल्प करना चाहिए। इसके पश्चात भगवान की पूजा करनी चाहिए। इसके बाद ब्राह्मण को भोजन करवाकर दान-दक्षिणा देकर विदा करने के पश्चात व्रती को स्वयं भोजन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस एकादशी का व्रत दोनों रखें। यह एकादशी धन-वैभव देती है तथा पापों का नाश कर उत्तम गति भी प्रदान करने वाली होती है। धनाधिपति कुबेर ने भी इस एकादशी व्रत का पालन किया था जिससे प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें धनाध्यक्ष का पद प्रदान किया। ऋषि की बात सुनकर दोनों आनंदित हो उठे और समय आने पर सुमेधा और उनकी पत्नी ने विधिपूर्वक इस एकादशी का व्रत रखा जिससे उनकी गरीबी दूर हो गई और पृथ्वी पर काफी वर्षों तक सुख भोगने के पश्चात वे पति-पत्नी श्रीविष्णु के उत्तम लोक को प्रस्थान कर गए। अत: हे नारद! जो कोई मनुष्य विधिपूर्वक इस व्रत को करेगा, भगवान विष्णु निश्चित ही उनका कल्याण करते हैं।
नाड़ीवैद्य पंडित डॉ.नागेंद्र नारायण शर्मा

