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September 17, 2026
झीरम  का फसला आधा अधूरा न्याय,  जयसिंह
कोरबा छत्तीसगढ़ राजनीति

झीरम का फसला आधा अधूरा न्याय, जयसिंह

Sep 8, 2026

  • भाजपा नहीं चाहती झीरम का सच सामने आये
  • मुख्य आरोपी को बचाना चाहती है भाजपा

पूर्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल ने काँग्रेस कार्यालय कोरबा में प्रेस कॉन्फ्रेंस में झीरम घाटी नक्सली हमले के मुख्य आरोपी को बचाने का आरोप लगाया है 06 सितंबर को आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में श्री सिंह ने बताया कि 03 मई 2013 को हुये झीरम नरसंहार, जिसमें कांगेस के वरिष्ठ नेताओं सहित कुल 32 नेताओं की हत्या हई थी। इस मामले में एनआईए कोर्ट का फैसला आया है। झीरम हत्याकांड में एनआईए कोर्ट का फैसला आया है, यह आधा अधरा न्याय है। अदालत के फैसले का आदर करते है। अदालत ने वही फैसला दिया है जो तथ्य एनआईए ने अदालत के सामने रखे थे। उन्होंने कहा कि एनआईए की जांच शरू से दिशाहीन रही है एनआईए ने घटना के राजनैतिक ‘षडयंत्रों’ के पहलओं की जांच नहीं किया था, जिन 10 लोगों को एनआइए ने गिरफ्तार किया था और जिनको दोषी पाया’ गया है वे छोटे नक्सली थे। इतनी बडी घटना बिना बड़े नक्सली नेताओं के संभव नहीं थी। एनआईए ने बडे नक्सली नेताओं का नाम शुरू के एफआईआर में शामिल किया था लेकिन बाद में उन्हें हटा दिया। उन्होंने कहा कि बडा सवाल इस फैसले से घटना की साजिश” का पर्दाफाश” नहीं हुआ है। कांग्रेस की परिवर्तन की यात्रा सुरक्षा क्योंहटार्ड गयी थी? यात्रा के मार्ग को किसने और क्यों बदलवाया था? हमले की योजना किसके दवारा बनायीं गयी थी जब-जब बडे नक्सलियों ने समर्पण किया तब-तब सरकार ने दावा किया कि यह झीरम हमले में शामिल थे। एनआईए ने उनसे पूछताछ क्यों नहीं किया? घटना के प्रत्यक्षदर्शियों में से ‘ जो कि उस समय घायल भी थे, उनमें से कितनों से एनआईए ने पूछताछ की

झीरम हमले के दौरान घायल और जीवित बचे पीडितों का बयान तक नहीं लिया गया कई बार प्रभावित लोग जांच एजेंसियो के समक्ष शपथ पत्र के साथ हाजिर हुए लेकिन उनके बयान शामिल ही नहीं किये गये। हत्याकांड के हफ्तों बाद भी शहीदों और घायलों के पर्स फाईले, महत्वपर्ण दस्तावेज बिखरे पड़़े रहे, किसी का भी मोबाईल जप्त नहीं किया गया। एनआईए ने छत्तीसगढ़ सरकार की पुलिस दवारा गठित एसआईटी को जांच से क्यों रोका? एनआईए ने तत्कालीन मुख्यमन्त्री, गृहमंत्री, मुख्य सचिव, डीजीपी, एडीसी नक्सल ऑपरेशन से कब पूछताछ किया?
जांच के दायरे से बडे नक्सली नेताओं के नाम क्यों हटाये गए?
शुआत में एनआईए की एफआईआर में दो प्रमख नक्सली नेता गणपति (मपल्ला लक्ष्मण राव) और रमन्ना का भी नाम था
21 मार्च 2014 को गणपति और रमन्ना सहित 26 फरार आरोपियों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया था, फिर चार्ज शीट से उनका नाम क्यों हटाया गया

अगस्त 2014 तक इनका सूची में शामिल नाम था लेकिन सितंबर 2014 में जो अदालत में प्रारंभिक चार्जशीट तथा अंतिम चार्ज शीट प्रस्तुत की गयी उसमें से उनका नाम हटा दिया गया। यह क्यों हूआ इनका नाम क्यों हटाया गया?

एनआईए की शुरूआती जांच में देवा (बारसे स्क्का उफ़ देवा) का नाम झीरम में शामिल नक्सलियों में था, एनआईए को वांछित भी घोषित किया था, उस पर ईनाम भी घोषित था, फिर उससे पूछताछ क्यों नही हई

एनआईए ने जिन 26 लोगों को नामजद कर फरार घोषित किया था, उसमें बसवराजू गणेश ऊइके, रूपेश ऊर्फ संजीव, सरेन्द्र ऊर्फ रामचंद्र रेडइडी, जयदेव उर्फ बड्डा देव, सोनू उर्फ भूपति के नाम थे, इनमे से अनेकों ने आत्मसमर्पण किया है। एनआईए ने उनसे पूछताछ कब किया? क्या वे उन्हें एनआईए ने निर्दोष मान लिया है। झीरम में शामिल सरेंडर नक्सलियो से कब पूछताछ हई झीरम घाटी हत्याकांड (दरभा घाटी हमला) में शामिल और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) व प्लिस दवारा वांछित । फरार घोषित कई प्रमख नक्सलियों ने समय- समय पर पुलिस एवं स्रक्षा बलों के समक्ष आत्मसमर्पण (सरेंडर) किया है। इनमें प्रमुख नाम हैं चैत उर्फ श्याम दादा (DKSZC सदस्य) इनामः 25 लाख रू. भूमिकाः दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी (DKSZC) का वरिष्ठ सदस्य और झीरम घाटी हमले की साजिश रचने व दरभा डिवीजन को संचालित करने का मख्य सत्रधार । मास्टरमाइंड । इन्होंने अपने 9 अन्य कैडर सहयोगियों सरोज उर्फ मलक सोढ़ी, भूपेश फुरामी आदि के साथ बस्तर पलिस के समक्ष आत्मसमर्पण किया। रूपेश उर्फ मोल्ला राजिरेडडी (केंद्रीय समिति सदस्य । नक्सली कमांडर) भूमिका माओवादी संगठन के शीर्ष कमांडरों में शामिल। सरेंडर के बाद इन्होंने सार्वजनिक रूप से बयान दिया कि झीरम घाटी नरसंहार संगठन की एक बड़ी गलती और नीतिगत विफलता थी। निर्मला उर्फ समित्रा (महिला कैडर) इनामः 20 लाख रू. भूमिकाः झीरम घाटी हमले की घटना के दौरान अग्रिम मोर्चे और लॉजिस्टिक सपोर्ट में सक्रिय रहीं, इस इनामी महिला नक्सली ने बस्तर में सरक्षा बलों के समक्ष सरेंडर किया। 41 करोड के इनामी (केंदीय और अलग-अलग राज्यों की एजेंसियों दवारा संयक्त) भूपति उर्फ सोनू दादा ने ‘महाराष्ट्र के मुख्यमन्त्री की उपस्थिति में गढ़चिढौली में समर्पण किया।

केंद्रीय समिति सदस्य सूजाता ने सितंबर 2025 में तेलंगाना में समर्पण किया इस पर छत्तीसगढ ने 40 लाख और तेलंगाना ने 25 लाख का ईनाम घोषित था। इनसे पूछताछ क्यों नहीं किया गया, अभियोजित क्यों नहीं किया गया भाजपा नहीं चाहती झीरम का सच सामने आये

झीरम मामले में भाजपा की तत्कालीन सरकार शूरू से संदिग्ध रही है। भाजपा ने इस मामले की जांच को रोकने या उसकी दिशा को भटकाने का हर संभव प्रयास किया। भाजपा के वरिष्ठ नेता तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक न्यायिक जांच आयोग के खिलाफ स्टे लेकर आये थे। कांग्रेस की सरकार ने छत्तीसगढ़ पूलिस की एसआईटी का गठन किया तो एनआर्डए जांच रोकने के लिए स्टे लेकर आ गया
सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ पलिस की एसआईटी को जांच के पक्ष में फैसला दिया तो ढाई साल में साय सरकार ने जांच नहीं शरू किया। भाजपा नहीं चाहती झीरम का सच सामने आये। एनआईए की जांच और कार्य प्रणाली से भी यही साबित हआ है।
घटना के वक्त भी सरकार व नक्सलियों में साठ-गांठ थी और अब फैसला आने के बाद भी बड़े नक्सली लीडरों को एनआईए से बचाया गया है जो सरकार व एनआईए का नक्सलियों से साठ-गांठ का सूपष्ट प्रमाण है